विज्ञानं के विकास के लिए राष्ट्र नीति जरूरी

Need of national policy for science & research development in india

हाल में विज्ञान के सबसे बड़े सालाना सम्मेलन- भारतीय विज्ञान कांग्रेस का इंफल में उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वैज्ञानिक आम लोगों के फायदे के लिए अनुसंधान करें और वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाज तक पहुंचाएं। इससे युवाओं में वैज्ञानिक चेतना जाग्रत होगी और शोध-अनुसंधान का माहौल भी बनेगा।

असल में पिछले एक सौ चार सालों से चल रहे विज्ञान कांग्रेस के इस आयोजन का भी मुख्य उद्देश्य आम आदमी तक विज्ञान का लाभ पहुंचा कर सतत शोध और विकास को बढ़ावा देना है। लेकिन  विज्ञान कांग्रेस जैसे बड़े आयोजन भी अब एक रस्म अदायगी बन कर रह गए हैं। पिछले कई दशकों से देश में एक भी ऐसा वैज्ञानिक शोध नहीं हुआ जिसे दुनिया उसकी विशिष्ट देन के कारण पहचान सके। देश में बुनियादी विज्ञान और शोध की स्थिति ठीक नहीं है।

जमीनी सच्चाई :-

जमीनी सच्चाई यह है कि अभी भी देश में विज्ञान, वैज्ञानिक संचार, विज्ञान चेतना और उत्कृष्ट वैज्ञानिक शोध का अभाव दिखता है :-

  • विज्ञान के लिए बजट बहुत कम है :- हर साल विज्ञान कांग्रेस में कहा जाता है कि सरकार विज्ञान के लिए बजट में जीडीपी का दो फीसद खर्च करेगी, लेकिन यह वादा हमेशा अधूरा रह जाता है। इस बार भी केंद्रीय बजट में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पूरे क्षेत्र का बजट जीडीपी का लगभग एक फीसद ही आवंटित किया गया।
  • एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर शोधपत्रों के प्रकाशन के मामले में भी भारत, चीन और अमेरिका से काफी पीछे है। अमेरिका में हर साल भारत से दस गुना ज्यादा और चीन में सात गुना ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित होते हैं। ब्राजील में भी हमसे तीन गुना अधिक शोधपत्र प्रकाशित होते हैं। शोधपत्रों के प्रकाशन में वैश्विक स्तर पर हमारी हिस्सेदारी महज दो फीसद है।
  • भारत में प्रति दस हजार लोगों पर केवल चार वैज्ञानिक शोध करने वाले हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन, दोनों में यह आंकड़ा उनयासी का है। जबकि रूस में अट्ठावन और चीन में अठारह का है।
  • विज्ञान और तकनीक में योगदान के मामले में विश्व में भारत इक्कीसवें नंबर पर है।
  • सीएसआइआर का एक सर्वे बताता है कि हर साल जो करीब तीन हजार अनुसंधान-पत्र तैयार होते हैं, उनमें कोई नया विचार नहीं होता।
  • वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थानों की कार्यकुशलता का पैमाना वैज्ञानिक शोधपत्रों का प्रकाशन और पेटेंटों की संख्या है। लेकिन इन दोनों ही क्षेत्रों में गिरावट आई है।

देश के हालात ऐसे हैं कि आज के इस आधुनिक युग में भी ‘विज्ञान’ आम आदमी से काफी दूर है। हम अभी तक आम आदमी में वैज्ञानिक चेतना का विकास नहीं कर पाए हैं और यही वजह है कि देश में अंधविश्वास का बोलबाला है, खासतौर से गांव और कस्बों में अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं।

सरकार को क्या करना चाहिए ?

आज जरूरत लोगों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने की है। देश के विकास में विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान है और हर नागरिक को विज्ञान से जोड़े बिना सर्वांगीण विकास संभव नहीं है जिसके लिए सरकार को :-

  • विज्ञान संचार की दिशा में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को काफी काम करना है। समाज के हर तबके तक विज्ञान और तकनीक की पहुंच होनी चाहिए।
  • डिजिटल कनेक्टिविटी के साथ विज्ञान की बुनियादी समझ को विकसित करने के लिए एक तंत्र की जरूरत है। देश में शोध और अनुसंधान का माहौल होगा तभी ‘मेक इन इंडिया’ का सपना भी पूरा हो सकेगा और हम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो सकेंगे।
  • देश में विज्ञान की शिक्षा की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता है क्योंकि छात्र समझने और प्रयोग करके सीखने के बजाय सिर्फ रटने पर जोर देते हैं।  इस बार विज्ञान कांग्रेस का मूल विषय था- विज्ञान और तकनीक से दूर लोगों तक इसकी पहुंच को आसान बनाना, यानी वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान ऐसी नई खोजों पर होना चाहिए जो आम आदमी की जिंदगी बदल सकते हैं।
  • बेहतर निजी संस्थानों को आर्थिक मदद भी करनी होगी जिससे वे भी अपना योगदान दे सकें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज पंचानबे प्रतिशत निजी संस्थान हैं, जबकि सिर्फ पांच प्रतिशत सरकारी संस्थान हैं।

आज जरूरत है विज्ञान के विषय में गंभीरता से एक राष्ट्रीय नीति बनाने और उस पर संजीदगी से अमल करने की। मेधावी छात्रों को विज्ञान विषय पढ़ने के लिए आकर्षित करने, विज्ञान के छात्रों और शोधार्थियों को रोजगार की गारंटी देने जैसे कदम भी उठाने होंगे, ताकि देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का एक सकारात्मक माहौल बने।

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